Skip to main content

Madhushravani Vrat Katha : सुहाग का अनोखा पर्व मधुश्रावणी, ऐसी है कथा

सावन शुक्ल तृतीया तिथि को सुहाग का पर्व हरियाली तीज और मधुश्रावणी का पर्व मनाया जा रहा है। मधुश्रावणी मुख्य रूप बिहार के मिथिला क्षेत्र में प्रचलित त्योहार है। सुहागन स्त्रियां इस व्रत के प्रति गहरी आस्था रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत पूजन से वैवाहिक जीवन में स्नेह और सुहाग बना रहता है। मधुश्रावणी व्रत को लेकर सबसे ज्यादा उत्साह और उमंग नवविवाहिता कन्याओं में देखने को मिलता है। नवविवाहित कन्याएं श्रावण कृष्ण पंचमी के दिन से सावन शुक्ल तृतीया तक यानी 14 दिनों तक दिन में बस एक समय भोजन करती हैं। आमतौर पर कन्याएं इन दिनों में मायके में रहती हैं और साज ऋंगार के साथ नियमित शाम में फूल चुनती हैं और डाला सजाती हैं। फिर इस डाले के फूलों से अगले दिन विषहर यानी नागवंश की पूजा करती हैं।

श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन इस पर्व का समापन मधुश्रावणी के रूप में होता है। इस पूरे पर्व के दौरान 14 दिनों की अलग-अलग कथाएं हैं जिनमें मधुश्रावणी दिन की रोचक कथा राजा श्रीकर और उनकी बेटी की है।

मधुश्रावणी व्रत कथा

राजा श्रीकर के यहां कन्या का जन्म हुआ तो राजा ने पंडितों को बुलवाकर उसकी कुंडली देखी। पंडितों ने बताया कि कन्या की कुंडली में कुछ दोष हैं जिससे इन्हें सौतन के तालाब में मिट्टी ढोना पड़ेगा। राजा इस बात से दुखी हुए और कुछ समय बीतने पर परलोक सिधार गए। इसके बाद राजा श्रीकर के पुत्र चंद्रकर राजा हुए। बहन से स्नेह के कारण वह नहीं चाहते थे कि बहन को सौतन के दबाव में रहना पड़े।

चंद्रकर ने एक घने वन में सुरंग बनवा दिया जिसमें एक दासी के साथ राजकुमारी के रहने की व्यवस्था करवा दी ताकि किसी पुरुष से इनकी मुलाकात ना हो। लेकिन भाग्य को तो कुछ और ही मंजूर था। एक दिन सुवर्ण नाम के राजा उस वन में आए और शिकार खेलते हुए उस सुरंग के पास आ गए। राजा को प्यास भी खूब लगी थी इसलिए वन में पानी की तलाश में थे। अचानक राजा की नजर चींटियों पर गई जो मुंह में चावल का दाना लिए कतार में चल रही थीं। राजा ने चींटियों का पीछा करना शुरू किया तो एक सुरंग के अंदर पहुंच गए।



यहां राजकुमारी से राजा सुवर्ण की मुलाकात हुई और दोनों ने विवाह कर लिया। कुछ समय तक दोनों सुरंग में ही साथ रहे। राजा को कुछ दिनों बाद राज्य की याद सताने लगी तो उन्होंने राजकुमारी से जाने की आज्ञा मांगी। राजकुमारी ने कहा कि सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मधुश्रावणी का पर्व होता है। उस दिन नवविवाहित कन्याएं ससुराल से आया हुआ अन्न खाती हैं और ससुराल से आए वस्त्र ही धारण करती हैं। इसलिए मधुश्रावणी से पहले इन्हें भेज दीजिएगा। राजा ने इस बात को स्वीकार कर लिया और जल्दी ही साथ ले जाने का वादा करते हुए अपनी राजधानी लौट गए।

राजा ने नगर के प्रमुख वस्त्र बनाने वाले को बुलवाया और सुंदर सी चुनरी बनाने का आदेश दिया। यह बात राजा की पहली पत्नी को पता चला तो उसने वस्त्र बनाने वाले को स्वर्ण का लालच देकर चुनरी पर छाती लात, झोंटा हाथ लिखने का आदेश दिया। इसका मतलब यह था कि तुम्हारी सौतन तुम्हारी छाती पर लाती मारेगी और बाल पकड़कर खींचेगी। वस्त्र बनाने वाले ने चुनारी को ऐसा लपेट कर दिया कि राजा यह समझ नहीं पाए कि इस पर कुछ लिखा भी है। राजा ने समय आने पर चुनरी को एक कौए को पहुंचाने के लिए दिया। पौराणिक कथाओं में कौए को भी संदेश वाहक के रूप में बताया गया है।

कौआ वस्त्र लेकर जा रहा थे लेकिन उसकी दृष्टि और भोज पर गई जिसे देखर कौआ सबकुछ भूल गया और चुनरी को छोड़कर जूठन खाने लग गया। मधुश्रावणी के दिन वस्त्र और अन्न नहीं पहुंचने से राजकुमारी नाराज हो गईं। राजकुमारी ने सफेद फूल और सफेद ही चंदन लेकर माता पार्वती की पूजा की और देवी से विनती करते हुए बोली कि जिस दिन राजा से उनकी भेंट हो उनकी आवाज चली जाए।

दूसरी ओर राजकुमारी के भाई चंद्रकर को जब बहन के विवाह की बात पता चली तो वह नाराज हो गया और बहन को खाने-पीने की चीजें भेजना बंद कर दिया। ऐसे में राजकुमारी और उनकी दासी को कई दिनों तक भूखा ही रहना पड़ा। इस बीच एक दिन पता चला की पास में तालाब खोदने का काम चल रहा है तो राजकुमारी अपनी दासी के साथ तालाब पर मिट्टी उठाने चल गई ताकि गुजरे के लिए धन मिल जाए।

संयोग की बात है कि उस दिन राजा सवर्ण भी वहां तालाब पर आए हुए थे क्योंकि राजा की पहली पत्नी उस तालाब को खुदवा रही थी। राजा ने राजकुमारी को पहचान लिया और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। राजा अपने साथ राजकुमारी को लेकर महल चले आए और राजकुमारी को रानी का स्थान दिलाया। लेकिन राजकुमारी अब बोल नहीं सकती थी। राजा को इसका कारण दासी से पता चला तो उन्होंने ने बताया कि उन्होंने तो चुनरी भेजी थी। राजा ने जब घटना की जांच करवाई तो सारी बातें सामने आ गई और तब पता चला कि यह सारी उलझन कौए की वजह से हुई है।

राजा ने चुनरी भी तलाश करवा ली जिस पर बड़ी रानी का भेजा संदेश लिखा था। राजा इस बात से बड़ी रानी पर नाराज हुए और उन्हें मृत्युदंड दिया। अगले वर्ष जब मधुश्रावणी आई तो राजकुमारी ने लाल फूलों और लाल वस्त्र से माता पार्वती का पूजन किया और आवाज लौटाने की प्रार्थना की जिससे राजकुमारी की वाणी लौट आई। इसके बाद राजा स्वर्ण और राजकुमारी वर्षों तक वैवाहिक जीवन का सुख भोगते रहे





Comments

Popular posts from this blog

बम-बम भैरो हो भूपाल, अपनी नगरिया भोला, खेबि लगाबऽ पार । नचारी गीत

बम-बम भैरो हो भूपाल, अपनी नगरिया भोला, खेबि लगाबऽ पार । कथी के नाव-नेवरिया, कथी करूआरि, कोने लाला खेवनहारे, कोन उतारे पार । सोने केर नाव-नेवरिया, रूपे करूआरि, भैरो लाला खेवनहार...

तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं

तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं मधुश्रावणी के दिन जलते दीप के बाती से शरीर कुछ स्थानों पर [ घुटने और पैर के पंजे ] दागने की परम्परा भी वर्षों से चली आ रही हैं। इसे ही टेमी दागना कहते हैं । सावन का महीना आते ही मिथिलांचल संस्कृति से ओत-प्रोत मधुश्रावणी की गीत गूंजने लगे हैं। लोक पर्व मधुश्रावणी की तैयारियों में नव विवाहिताएं जुट गई हैं। पति की लंबी आयु की कामना के लिए चौदह दिवसीय यह पूजा सिर्फ मिथिला वासियों के बीच हीं होता है । यह पावन पर्व मिथिला की नवविवाहिता बहुत ही धूम-धाम के साथ दुल्हन के रूप में सजधज कर मनाती है। मैथिल संस्कृति के अनुसार शादी के पहले साल के सावन माह में नव विवाहिताएं मधुश्रावणी का व्रत करती हैं। सावन के कृष्ण पक्ष के पंचमी के दिन यानि 24 जुलाई से मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत हुई और पांच अगस्त को इसका समापन होगा। इस वर्ष यह पर्व 14 दिनों का होगा। मैथिल समाज की नव विवाहितों के घर मधुश्रावणी का पर्व विधि-विधान से होता है । इस पर्व में मिट्टी की मूर्तियां, विषहरा, शिव-पार्वती बनाया जाता है मधुश्रावणी जीवन में सि...

मधुश्रावणी व्रत कथा : पाँच दिनकथा

महादेब परिबारक वर्णन :- दक्ष, सती के प्राण त्याग्लाक बाद हिमालय के रूप में अवतार लैथ I हुनका क्रमशः पाँच टा कन्या भेलनि उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आ संध्या । एही पाँचो क विवाह बेरि बेरि महादेव सं भेलनि। उमाक उत्पति आ महादेब संग जुडब :- हिमालय के मनाइन नामक स्त्री सं एकटा बेटी भेलखिन। जखन ओ पाँच वर्ष क भेलि त महादेव क वर रूप में प्राप्त करवाक कामना सं तपस्या करवा हेतु विदा भेलि । मनाईन मना करैत रहि गेलखिन मुदा ओ नहि मानलि तें हुनकर नाम उमा पङलैन । आठ वर्ष क भेला पर महादेव हुनका तपस्या से प्रसन्न भई हुनका सं विवाह क लेलैथ आ मनाईन अपन माथ पिटैत रहि गेली कि हुनकर सुकुमारी क विवाह बूढ बर सं भ गेल। पार्वतीक उत्पति आ महादेव संग बिआह :- हिमालय क दोसर बेटी पार्वती भेलखिन। पार्वती एक दिन फूल तोरबाक लेल कनक शिखर पर गेलखिन । ओतए एकटा बूढबा क बसहा पर चढल आ डमरू बजबैत देखलखिन। पार्वती चिन्ह गेलखिन जे इत साक्षात् महादेव छैथ। सखि सब के मना केला क बादो  ओ ओकरा सब के घर विदा क बसहा पर बैसी महदेव संगे चलि गेली। मानाइन फेर कानैत बाजैत रहि गेली । गंगाक आविर्भाव :- हिमालय क तेसर बेटी भेलखिन गंगा। ओ जखन पै...