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सभहक दुख अहाँ हरे छी भोला, हमरा किए बिसरै छो यो ।नचारी गीत

सभहक दुख अहाँ हरे छी भोला, हमरा किए बिसरै छो यो ।
हमहूँ सेवक अहीं के भोला, कोनो विधि निम छो यो ।
कपारो फटल, बेमायो फादल, किन्तु हम चलै छो यो ।
द्वारे डाढ़ अहाँकै हमहूँ, पापी जानि टरै छो यो ।
सेवक अहाँक पुकारि रहल अछि, झाड़खण्ड बैसत छो यो ।
आचों कृपा करू प्रभु हमरा पर, दुखिया देखि भुलै छी यो ।
त्रिभुवन नाथ दिगम्बर भोला, सभटा अहाँ जनै ॐ यो ।

बम-बम भैरो हो भूपाल,
अपनी नगरिया भोला, खेबि लगाऽ शर।
कथी के नाव-नेवरिया, कथ्ी करूआरि,
कोने लाला खेवनहारे, कोन उतारे पार ।
सोने केर नाव-नेवरिया, रूपे करूआरि,
भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार ।
जै तोहें भैरो लाला खेबि लगायब पार,
मोतीचूर के लडुआ चदाब परसाई ।
हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै निशान,
बाबा के कमरथुआ चले, उठै धमसात ।
छोटे-मोटे भैरो लाला, हाधीमे गुलेल,
शशिधर के दोगे-दोगे रहथि अकेल ।

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तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं

तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं मधुश्रावणी के दिन जलते दीप के बाती से शरीर कुछ स्थानों पर [ घुटने और पैर के पंजे ] दागने की परम्परा भी वर्षों से चली आ रही हैं। इसे ही टेमी दागना कहते हैं । सावन का महीना आते ही मिथिलांचल संस्कृति से ओत-प्रोत मधुश्रावणी की गीत गूंजने लगे हैं। लोक पर्व मधुश्रावणी की तैयारियों में नव विवाहिताएं जुट गई हैं। पति की लंबी आयु की कामना के लिए चौदह दिवसीय यह पूजा सिर्फ मिथिला वासियों के बीच हीं होता है । यह पावन पर्व मिथिला की नवविवाहिता बहुत ही धूम-धाम के साथ दुल्हन के रूप में सजधज कर मनाती है। मैथिल संस्कृति के अनुसार शादी के पहले साल के सावन माह में नव विवाहिताएं मधुश्रावणी का व्रत करती हैं। सावन के कृष्ण पक्ष के पंचमी के दिन यानि 24 जुलाई से मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत हुई और पांच अगस्त को इसका समापन होगा। इस वर्ष यह पर्व 14 दिनों का होगा। मैथिल समाज की नव विवाहितों के घर मधुश्रावणी का पर्व विधि-विधान से होता है । इस पर्व में मिट्टी की मूर्तियां, विषहरा, शिव-पार्वती बनाया जाता है मधुश्रावणी जीवन में सि...

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