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पराती

प्रिये हम जाइत छी वनवास
सत्य प्रतिज्ञा कयलनि पिताजी, कैकेयी कयल प्रयास
कौशिल्या सन सासु महलमे, तखन सिय रहु धय आश
हिनकर सेवा करब उचित थिक, धैर्यहि विपत्तिक नाश
कन्द मूल फल संयोगहि भेटत, लागत भूख पियास
दुर्गम बाट दिन विकट जौं, लेब कहाँ कऽ बास
प्रिय हम जाइत छी वनवास

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तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं

तपस्या के समान है मधुश्रावणी की यह पूजा, 14 दिनों तक महिलाएं नमक नहीं खाती हैं मधुश्रावणी के दिन जलते दीप के बाती से शरीर कुछ स्थानों पर [ घुटने और पैर के पंजे ] दागने की परम्परा भी वर्षों से चली आ रही हैं। इसे ही टेमी दागना कहते हैं । सावन का महीना आते ही मिथिलांचल संस्कृति से ओत-प्रोत मधुश्रावणी की गीत गूंजने लगे हैं। लोक पर्व मधुश्रावणी की तैयारियों में नव विवाहिताएं जुट गई हैं। पति की लंबी आयु की कामना के लिए चौदह दिवसीय यह पूजा सिर्फ मिथिला वासियों के बीच हीं होता है । यह पावन पर्व मिथिला की नवविवाहिता बहुत ही धूम-धाम के साथ दुल्हन के रूप में सजधज कर मनाती है। मैथिल संस्कृति के अनुसार शादी के पहले साल के सावन माह में नव विवाहिताएं मधुश्रावणी का व्रत करती हैं। सावन के कृष्ण पक्ष के पंचमी के दिन यानि 24 जुलाई से मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत हुई और पांच अगस्त को इसका समापन होगा। इस वर्ष यह पर्व 14 दिनों का होगा। मैथिल समाज की नव विवाहितों के घर मधुश्रावणी का पर्व विधि-विधान से होता है । इस पर्व में मिट्टी की मूर्तियां, विषहरा, शिव-पार्वती बनाया जाता है मधुश्रावणी जीवन में सि...

मधुश्रावणी व्रत कथा : पाँच दिनकथा

महादेब परिबारक वर्णन :- दक्ष, सती के प्राण त्याग्लाक बाद हिमालय के रूप में अवतार लैथ I हुनका क्रमशः पाँच टा कन्या भेलनि उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आ संध्या । एही पाँचो क विवाह बेरि बेरि महादेव सं भेलनि। उमाक उत्पति आ महादेब संग जुडब :- हिमालय के मनाइन नामक स्त्री सं एकटा बेटी भेलखिन। जखन ओ पाँच वर्ष क भेलि त महादेव क वर रूप में प्राप्त करवाक कामना सं तपस्या करवा हेतु विदा भेलि । मनाईन मना करैत रहि गेलखिन मुदा ओ नहि मानलि तें हुनकर नाम उमा पङलैन । आठ वर्ष क भेला पर महादेव हुनका तपस्या से प्रसन्न भई हुनका सं विवाह क लेलैथ आ मनाईन अपन माथ पिटैत रहि गेली कि हुनकर सुकुमारी क विवाह बूढ बर सं भ गेल। पार्वतीक उत्पति आ महादेव संग बिआह :- हिमालय क दोसर बेटी पार्वती भेलखिन। पार्वती एक दिन फूल तोरबाक लेल कनक शिखर पर गेलखिन । ओतए एकटा बूढबा क बसहा पर चढल आ डमरू बजबैत देखलखिन। पार्वती चिन्ह गेलखिन जे इत साक्षात् महादेव छैथ। सखि सब के मना केला क बादो  ओ ओकरा सब के घर विदा क बसहा पर बैसी महदेव संगे चलि गेली। मानाइन फेर कानैत बाजैत रहि गेली । गंगाक आविर्भाव :- हिमालय क तेसर बेटी भेलखिन गंगा। ओ जखन पै...